नया साल, नयी रात,
नये अरमान, नये जज़्बात,
एक train of thoughts में बैठे तो हैं,
पर कुछ ख़ास नहीं हो रहा है,,
बस, वही General बात!!
सारा सारा समय,
पूरी पूरी रात..
समझ लो जैसे ये एक puzzle है,
और हर एक यात्री का पूरा पूरा शरीर,
इस एक puzzle के पूरे शरीर का
बस एक छोटा टुकड़ा है..
सभी चिपके हैं,
और दूर भी,,
बड़े शौक़ीन हैं
पर मजबूर भी..
और अब जब साल की शुरुआत,
हो ही चुकी है इस पहेली के साथ,
तो बस इतना याद रखना,
की इस extremely general रात
में जरूर छुपी है
(शायद ज़रा गहराई में)
कुछ सोचने वाली बात..
क्या समझे?